केंद्रीय हिंदी निदेशालय (उच्चतर शिक्षा विभाग)
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हिंदी का उद्भव
   
 

देवनागरी का उदय

 
 

'देव' और 'नागरी' इन दो शब्दों से निर्मित शब्द 'देवनागरी' को कभी-कभी एक साथ जोड़ कर लिखा जाता है तो कभी इसे दो अलग-अलग शब्दों में "देव नागरी" के रूप में भी लिखते हैं

अधिकतर भारतीय भाषाएँ, इनमें भी विशेषत: हिंदी और संस्कृत, देवनागरी या नागरी लिपि में लिखी जाती हैं । मराठी भाषा के लिए एक-दो अतिरिक्‍त वर्णो के अलावा, इसका यथावत् प्रयोग किया जाता है । तथा भारत भर में गुजराती तथा अन्य कई भाषाओं में इस लिपि के स्थानीय परिवर्तित रूप  प्रयुक्‍त होते हैं ।

वेद पुराण आदि कई हिंदू धर्मग्रंथ देवनागरी में ही रचे गए हैं, जबकि तथा इसके परिवर्तित रूपों में शिलालेख और पट्ट-आलेख उपलब्ध हैं । अत: इतिहासविदों तथा पुरातत्वविदों के लिए देवनागरी को जानना-समझना अत्यावश्यक माना गया है । 'देवनागरी'  दो भिन्‍न शब्दों से बना समस्त पद है : 'देव' अर्थात् ईश्‍वर अथवा उपास्य तथा 'नागरी' अर्थात मूलत: नगर अथवा शहर से संबंधित । इस शब्द की व्युत्पत्ति यह बताती है कि एक काल विशेष में यह लिपि एक मुख्य व्यवहार के लिए प्रयुक्‍त हुई होगी । इसके सुयोजित निर्माण में कार्यरत रही ता की सतर्कता का एक सशक्‍त उदाहरण है

 
 
 
 
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