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ब्राहमी लिपि - प्रयोग काल

 
 

5वीं सती ई. पू. समय तक भारतीय के एक बड़े भू-भाग में लिपि का प्रयोग मिलता है ।  के अनेक पाठांतर रहे हैं इस लेखन का प्रारंभ और भी प्राचीन काल से लक्षित होता है । महान भारतीय सम्राट अशोक ने भगवान के उपदेशों पर आधारित विधियों (नियमों) को इसी लिपि के विभिन्‍न रूपों में स्मारक-स्तंभों पर अंकित करवाया था ।

 
 
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ब्राहमी - इसकी उत्पत्ति से संबंधित मत

 
 

इस लेखन- की के संबंध में अनेक मत मिलते हैं । बूलर, वेवर आदि इसे उत्‍तरी सेमेटिक (सामी) लिपि से निकला मानते हैं क्योंकि "अ" ध्वनि के लिए प्रयुक्‍त वर्ण सेमेटिक वर्ण "अलिफ" के समान है । इसी प्रकार ढ, ठ, ल और र ये सभी अपने सेमेटिक समकक्ष वर्णों के निकटवर्ती प्रतीत होते हैं ।

दूसरा मत इसे दक्षिण सेमेटिक मूल से जोड़ता है । तथापि, इस मत को अधिक स्वीकृति नही मिली ।

तीसरे मत के अनुसार की सिंधु घाटी लिपि से हुई है, 1900 वर्ष ई. पू. (हड़प्पा काल) के आसपास से लेकर 5वीं सती ई. पू. के मिले प्रथम शिलालेख के बीच के काल से इस मत के समर्थन में कोई भी लिखित प्रमाण अभी तक नहीं मिला है । तथा इसकी सहोदरी लेखन- खरोष्‍टी, सेमेटिक लिपियों से एकदम भिन्‍न है, जिसके कारण इनका इतिहास जानने में भ्रांति उपस्थित होती है ।

 
 
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ब्राहमी - स्वरूप

 
 

एक "आक्षरिक लिपि" है जिसमें पुरानी फारसी की भाँति प्रत्येक वर्ण में किसी भी व्यंजन के साथ अंतनिर्हित "अ" स्वर  जुड़ता है किंतु "अ" से इतर अन्य स्वर अपने मात्रा के रूप में व्यंजनों से जुड़ते हैं  । दो या दो से अधिक व्यंजन 'संयुक्‍त व्यंजन' का निर्माण करते हैं : जैसे क्या (क् + या) ।

 
 
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ब्राहमी - देवनागरी की जननी

 
 

लिपि देवनागरी सहित लगभग सभी भारतीय लेखन- की पूर्वज है । यही नहीं, कई अन्य एशियाई लिपियाँ - यथा बर्मी, थाई तथा तिब्बती लिपियाँ भी लिपि से ही विकसित हुई हैं । अत: लिपि ग्रीक (यावनी) लिपि की समानक भारतीय लिपि है जिसने विभिन्‍न लेखन- को जन्म दिया ।

 
 
 
 
 
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