केंद्रीय हिंदी निदेशालय (उच्चतर शिक्षा विभाग)
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पृष्‍ठभूमि

 
 
प्राकृतों एवं लौकिक संस्कृत का प्रयोग काल (कालगणना 'लगभग' की वाचक है) 
सन् 750 ई० पू० –
वैदिकोत्‍तर (लौकिक संस्कृत) संस्कृत का क्रमिक विकास ।
सन् 500 ई० पू० –
तथा जैन प्राकृत-ग्रंथों का (पूर्वी भारत) ।
सन् 400 ई० पू० –
पाणिनि अष्टाध्यायी (संस्कृत व्याकरण) का प्रणयन ( भारत) जिसमें वैदिक संस्कृत से पाणिनीय संस्कृत में स्वरूप परिवर्तन की झलक मिलती है ।
सन् 322 ई० पू० –
मौर्य नरेशों के प्राकृत (पाली) भाषा में उत्कीर्ण लिपि के शिलालेख ।
सन् 250 ई० पू० –
लौकिक संस्कृत का स्थितिकरण ।
सन् 100 ई० पू० से – सन् 100 ई०
शिलालेखों में प्राकृत के स्थान पर संस्कृत का क्रमश: प्रयोग ।
सन् 320 ई० पू० –
गुप्‍त लिपि अथवा मात्रिका लिपि का ( की उत्‍तरी शैली से जो कि 5वीं शती तक प्रयुक्‍त होती रही ।)
 
     
 
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